43 लाख से अधिक श्रमिकों के रिकॉर्ड पर नजर
बिहार में भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड से जुड़े लाखों श्रमिकों के रिकॉर्ड की जांच की जा रही है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, राज्य में 43 लाख से अधिक निर्माण श्रमिक पंजीकृत हैं। इन श्रमिकों को सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता दी जाती है।
जांच के दौरान लाभार्थियों के रिकॉर्ड में कई तरह की विसंगतियां सामने आने की बात कही गई है। इनमें मृत व्यक्तियों के नाम पर लाभ लेने और रिकॉर्ड में मृत्यु की तारीख से जुड़ी गड़बड़ियां भी शामिल हैं।
मृत श्रमिक को पहले जिंदा, फिर मृत दिखाने का आरोप
मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि कुछ रिकॉर्ड में ऐसे श्रमिकों को पहले जीवित दिखाया गया, जबकि बाद में उन्हीं के नाम पर मृत्यु की प्रविष्टि दर्ज की गई। इससे यह सवाल उठ रहा है कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में पात्र लाभार्थियों तक पहुंचा या नहीं।
हालांकि, प्रत्येक मामले में गड़बड़ी की प्रकृति और जिम्मेदार व्यक्ति की भूमिका जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
करोड़ों रुपये की सरकारी सहायता
निर्माण श्रमिकों के कल्याण के लिए सरकार की ओर से विभिन्न योजनाओं के माध्यम से बड़ी राशि खर्च की जाती है। रिपोर्टों में ₹802 करोड़ से अधिक की सहायता राशि से जुड़े आंकड़ों का उल्लेख किया गया है।
ऐसे में लाभार्थियों के रिकॉर्ड में गड़बड़ी सामने आने के बाद विभागीय स्तर पर डेटा की जांच और सत्यापन का महत्व बढ़ गया है।
कैसे होती है ऐसी गड़बड़ी?
लेबर कार्ड से जुड़े मामलों में लाभार्थी का पंजीकरण, दस्तावेजों का सत्यापन, बैंक खाते की जानकारी और विभिन्न योजनाओं के तहत भुगतान जैसे कई चरण शामिल होते हैं। किसी भी स्तर पर गलत जानकारी दर्ज होने या सत्यापन में लापरवाही होने पर सरकारी राशि के दुरुपयोग की संभावना पैदा हो सकती है।
अब रिकॉर्ड की होगी जांच
मामले के सामने आने के बाद संबंधित रिकॉर्ड की जांच और सत्यापन पर जोर दिया जा रहा है। अधिकारियों की जांच में यदि किसी कर्मचारी, बिचौलिये या अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके आधार पर कार्रवाई की जा सकती है।
क्या है बड़ा सवाल?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि मृत श्रमिकों के नाम रिकॉर्ड में कैसे सक्रिय रहे और उनके नाम पर सरकारी योजनाओं का लाभ किसे मिला? इसके साथ ही यह भी जांच का विषय है कि लाभार्थियों के सत्यापन की प्रक्रिया में कहां चूक हुई।
सरकार और संबंधित विभाग की जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कितने रिकॉर्ड वास्तविक रूप से गलत पाए गए और सरकारी राशि के दुरुपयोग में कौन-कौन जिम्मेदार है।