राजनीतिक हलचल: भाजपा ने भी दिखाया ठेंगा! ममता बनर्जी का साथ छोड़ने वाले नेता ‘न घर के रहे न घाट के’
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति से इस वक्त की सबसे बड़ी ख़बर सामने आ रही है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का साथ छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने वाले नेताओं की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। सूत्रों के हवाले से ख़बर है कि अब केंद्रीय और राज्य भाजपा नेतृत्व ने भी इन दलबदलू नेताओं को पूरी तरह से किनारे (ठेंगा) लगा दिया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज़ है कि ‘दीदी’ का साथ छोड़ने वाले ये दिग्गज अब पूरी तरह से “न घर के रहे, न घाट के”।
मुख्य बिंदु: आखिर क्यों अधर में लटका इन नेताओं का भविष्य?
- महत्व की भारी कमी: जो नेता कभी टीएमसी में रहते हुए सरकार और संगठन में नंबर-2 या शीर्ष पदों पर थे, उन्हें अब भाजपा में एक आम कार्यकर्ता या हाशिए पर रखे गए नेता की तरह देखा जा रहा है।
- स्थानीय नेताओं का विरोध: भाजपा के पुराने और जमीनी कार्यकर्ताओं ने बाहर से आए इन नेताओं को खुलकर स्वीकार नहीं किया, जिससे पार्टी के भीतर अंदरूनी कलह चरम पर है।
- दीदी के दरवाज़े भी बंद: ममता बनर्जी ने पहले ही साफ़ कर दिया है कि बगावत करने वाले गद्दारों के लिए टीएमसी में वापसी की कोई गुंजाइश नहीं है।
चुनावी नतीजों के बाद बदली रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा अब बंगाल में बाहरी नेताओं के भरोसे चुनाव जीतने की रणनीति से पीछे हट रही है। शीर्ष नेतृत्व अब अपने पुराने और निष्ठावान चेहरों को आगे बढ़ा रहा है। ऐसे में जो नेता कभी बड़ी-बड़ी शर्तों और उम्मीदों के साथ टीएमसी छोड़ भगवा खेमे में आए थे, उन्हें अब न तो संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी मिल रही है और न ही आगामी चुनावों में टिकट मिलने की कोई गारंटी दिख रही है।
क्या होगा अगला कदम?
अब सवाल यह उठता है कि इन नेताओं का राजनीतिक भविष्य क्या होगा? सूत्र बताते हैं कि हाशिए पर चल रहे कई नेता अब गुप्त तरीके से अन्य क्षेत्रीय दलों के संपर्क में हैं, लेकिन फ़िलहाल उनके सामने एक बड़ा राजनीतिक शून्य खड़ा है।